गुरु सेवा ही सार है
श्रीमद-भागवतम की महिमा
कृष्ण भक्ति-रस-स्वरूप श्री-भागवत।
ताते वेद-शास्त्र हैते परम महत्त्व॥
श्रीमद्भागवतम्, समस्त वेदों और उपनिषदों का सार है। यह कृष्ण-भक्ति-रस से युक्त है। यह ब्रह्म–सूत्र या वेदान्त–सूत्र की स्वाभाविक टीका है। वेदान्त–सूत्र का संकलन स्वयं श्रील व्यासदेव ने किया है, और उन्होंने ही इसकी टीका भी लिखी है।
यस्यां वै श्रूयमाणायां कृष्णे परमपूरुषे।
भक्तिरुत्पद्यते पुंस: शोकमोहभयापहा॥
श्रीमद्भागवतम् का प्रमाणिक स्रोत से श्रवण करने पर मनुष्य अति सहजता से कृष्ण-भक्ति विकसित कर सकता है। परिणामतः उसके भय, शोक और मोह पूर्णतः नष्ट हो जाते हैं।
केवल निर्मत्सर भक्त ही धर्म-तत्त्व को समझ सकते हैं
धर्म: प्रोज्झितकैतवोऽत्र परमो निर्मत्सराणां सतां
वेद्यं वास्तवमत्र वस्तु शिवदं तापत्रयोन्मूलनम्।
श्रीमद्भागवते महामुनिकृते किं वा परैरीश्वर:
सद्यो हृद्यवरुध्यतेऽत्र कृतिभि: शुश्रूषुभिस्तत्क्षणात्॥
श्रीमद्भागवतम् में केवल शुद्ध भागवत-धर्म का वर्णन है, इसमें कैतव-धर्म अर्थात छल युक्त धर्म का अंश भी नहीं है। कैतव चतुष्टय, कैतव-धर्म चार प्रकार के हैं - धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष। परन्तु, श्रीमद्भागवतम् शुद्ध कृष्ण-प्रेम-धर्म या प्रेम-पुमर्थः का प्रतिपादन करता हैं। श्रीमद्भागवतम् को कौन समझ सकता है? परमो निर्मत्सराणां सताम् वेद्यं, अर्थात् जो ईर्ष्यालु नहीं हैं, वे ही इस धर्म-तत्त्व को समझ सकते हैं।
प्रामाणिक स्रोत से श्रीमद्भागवतम् का श्रवण करें
प्रामाणिक वक्ता से श्रीमद्भागवतम् का श्रवण इतना प्रभावी होता है कि तत्क्षणात कृष्ण-भक्ति विकसित हो जाती है। इतना ही नहीं, सद्यो हृद्यवरुध्यतेऽत्र कृतिभि: शुश्रूषुभिस्तत्क्षणात्, भागवतम श्रवण की इच्छा मात्र से, हृदय में स्थित परम भगवान् तत्क्षणात् प्रकट हो जाते हैं। यदि कोइ प्रामाणिक स्रोत से श्रीमद्भागवतम् सुनता है और प्रेम-भक्ति विकसित करता है, तब भगवान् उस प्रेम से बंध जाते हैं। यही श्रीमद्भागवतम् के श्रवण का प्रभाव है।
समस्त वैदिक साहित्य का सार
अर्थोऽयं ब्रह्मसूत्राणां भारतार्थविनिर्णयः।
गायत्रीभाष्यरूपोऽसौ वेदार्थपरिबृंहितः॥
(गरुड़ पुराण)
श्रीमद्भागवतम् में निम्नलिखित चार विषय प्रतिपादित हैं:
- अर्थोऽयं ब्रह्मसूत्राणां - ब्रह्म-सूत्र का स्वाभाविक भाष्य।
- भारतार्थविनिर्णयः - महाभारत का तात्पर्य।
- गायत्रीभाष्य - गायत्री-मंत्र का भाष्य।
- वेदार्थ-विस्तार - समस्त वैदिक शिक्षाओं की विस्तृत व्याख्या।
श्रीमद्भागवतम् का प्रारम्भ गायत्री अर्थ से होता है।
गायत्रीर अर्थे एइ ग्रन्थ-आरम्भन ।
"सत्यं परं"- सम्बन्ध, "धीमहि"- साधन-प्रयोजन ॥
(चैतन्य-चरितामृत, मध्य-लीला 25.147)
चैतन्य-चरितामृत में वर्णन है - गायत्रीर अर्थे एइ ग्रन्थ-आरम्भन। ग्रन्थ भागवत आपना का आरंभ गायत्री अर्थ से होता है, जो कि गायत्री-मंत्र की व्याख्या है, सत्यं परं धीमहि। अतः श्रीमद्भागवतम् में गायत्री-भाष्य निहित है, और साथ ही समस्त वैदिक साहित्य का सार-तत्व भी।
कृष्ण चतुष् रूप में प्रकट होते हैं
भागवत, तुलसी, गङ्गाय, भक्त-जने ।
चतुर्धा विग्रह कृष्ण एइ चारि सने॥
“कृष्ण इस भौतिक जगत में चार रूपों में प्रकट होते हैं : श्रीमद्भागवत, तुलसी, गंगा, और भक्त-भागवत।” (चैतन्य-भागवत, मध्य-खण्ड 21.81)
श्रीमद्भागवतम् तुल्य अन्य कोई शास्त्र नहीं हैं
भागवत-शास्त्रे से भक्तिर तत्त्व कहे ।
तेञि भागवत-सम कोन शास्त्र नहे ॥
(चैतन्य-भागवत, अन्त्य-खण्ड 3.509)
“श्रीमद्भागवतम् के तुल्य अन्य कोई भी शास्त्र नहीं है क्योंकि इसमें प्रेम-भक्ति–तत्त्व का वर्णन है।”
श्रीभक्तिसिद्धांत सरस्वती गोस्वामी प्रभुपाद कहते हैं कि यदि इस संसार के सभी पुस्तकालयों के समस्त ग्रन्थ नष्ट हो जाएँ, तो भी कोई विशेष क्षति नहीं होगी, जब तक श्रीमद्भागवतम् सुरक्षित है, क्योंकि समस्त तत्त्व इस ग्रन्थ में विद्यमान है।
श्रीमद्भागवतम् प्रेम रस से पूर्ण है
प्रेम-मय भागवत-श्री-कृष्णेर अङ्ग ।
ताहाते कहेन यत गोप्य कृष्ण-रङ्ग॥
“श्रीमद्भागवतम् प्रेम रस से पूर्ण है। यह स्वयं भगवान् कृष्ण का शरीर है। इसमें भगवान् की समस्त मधुर और गोपनीय लीलाओं का वर्णन है।” (चैतन्य-भागवत, अन्त्य-खण्ड 3.516)
श्रीमद्भागवतम् श्रीकृष्ण से अभिन्न है; यह कृष्ण का दिव्य शरीर है, कृष्णेर श्री-अङ्ग। कृष्ण प्रेम-मय, सत्-चित्, और आनंदमय हैं; इसलिए भागवत भी प्रेम-मय है। ताहाते कहेन यत गोप्य कृष्ण-रङ्ग, इसमें कृष्ण की सभी गोपनीय, मधुर, रसपूर्ण लीलाएँ वर्णित हैं।
ग्रन्थ-भागवत और भक्त-भागवत
दुई स्थाने भागवत-नाम शुनि-मात्र, एको ग्रन्थ-भागवत, आर एको भक्त-भागवत - ‘भागवत’ शब्द दो अर्थों में प्रयुक्त होता है: ग्रन्थ-भागवत, और भक्त-भागवत।
दुई भागवत द्वारा दिया भक्ति-रस ।
ताँहार हृदये ताँर प्रेमे हय वश॥
(चैतन्य-चरितामृत, आदि-लीला 1.100)
ग्रन्थ-भागवत और भक्त-भागवत, इन दोनों भागवतों के माध्यम से भगवान श्रीकृष्ण भक्ति-रस या प्रेम-भक्ति प्रदान करते हैं। वे प्रेम-भक्ति द्वारा प्रेम-बंधन से बँध जाते हैं। ये सब श्रीमद्भागवतम् की महिमा हैं।
नित्यं भागवत-सेवया
भागवत ये ना माने, से—यवन-सम ।
तार शास्ता आछे जन्मे-जन्मे प्रभु यम ॥
“जो व्यक्ति श्रीमद्भागवतम् को स्वीकार नहीं करता, वह म्लेच्छ या यवन के समान है, और वह यमराज द्वारा जन्म–जन्मान्तर तक दण्डित होगा।” (चैतन्य–भागवत, आदि–खण्ड 1.39)
इसलिए, नित्यं भागवत–सेवया, प्रतिदिन भक्त-भागवत के पास जाकर भागवतम् का श्रवण और अध्ययन करें। स्थाने स्थिता: श्रुतिगतां तनुवाङ्मनोभिर्ये प्रायशोऽजित जितोऽप्यसि तैस्त्रिलोक्याम्, अर्थात् आपकी जो भी सामाजिक या आर्थिक स्थिति हो, उसे परिवर्तन करने की आवश्यकता नहीं है। केवल आपको भक्त-भागवत के संग में नित्य भागवत का श्रवण और अध्ययन करना है। इससे आपके हृदय में प्रेम-भक्ति विकसित होगी और आप अजित भगवान को भी जीत लेंगे, अजित जित। यद्द्यपि श्रीकृष्ण तीनों लोकों के लिए अजित हैं, प्रमाणिक स्रोत से श्रीमद्भागवतम् के श्रवण द्वारा आप कृष्ण-भक्ति विकसित करके उन्हें जीत सकते हैं। यह श्रीमद्भागवतम् के श्रवण का प्रभाव है। यह सब श्रीमद्भागवतम् का महात्म्य है। इसीलिए श्रीमद्भागवतम् पर प्रवचन और अध्ययन से पूर्व, भगवान् के समान ही हम भागवत का गुणगान करते है क्योंकि श्रीमद्भागवतम् और श्रीकृष्ण अभिन्न है।
गुरु सेवा ही सार है
वास्तविक जिज्ञासा क्या है?
कामस्य नेन्द्रियप्रीतिर्लाभो जीवेत यावता।
जीवस्य तत्त्वजिज्ञासा नार्थो यश्चेह कर्मभि:॥
“जीवन की इच्छाएँ इन्द्रियतृप्ति की ओर लक्षित नहीं होनी चाहिए। मनुष्य को केवल स्वस्थ जीवन की या आत्म-संरक्षण की कामना करनी चाहिए, क्योंकि मानव तो परम सत्य के विषय में जिज्ञासा करने के निमित्त बना है। मनुष्य की वृत्तियों का इसके अतिरिक्त, अन्य कोई लक्ष्य नहीं होना चाहिए।” (श्रीमद्भागवतम् 1.2.10)
वास्तविक जिज्ञासा क्या है? जिज्ञासा की विषय वस्तु क्या होनी चाहिए? जीवस्य तत्त्वजिज्ञासा नार्थो यश्चेह कर्मभि:, मनुष्य को शारीरिक सुख-सुविधाओं हेतु जिज्ञासा नहीं करनी चाहिए। “मैं अपनी भौतिक कामनाएँ कैसे पूरी करूँ?” “मैं कैसे अधिकाधिक भोग कर सकता हूँ?” ये सब तत्त्व-जिज्ञासा के विषय नहीं हैं। अतः इनके बारे में जिज्ञासा नहीं करनी चाहिए, कामस्य नेन्द्रियप्रीतिर्लाभो जीवेत यावता।
तो फिर जिज्ञासा का विषय क्या होना चाहिए? मेरे जीवन का उद्देश्य क्या है? मेरे जीवन का लक्ष्य क्या है? इस दुर्लभ मानव जन्म का वास्तविक उद्देश्य क्या है? इस जीवन की सर्वोच्च उपलब्धि क्या है? यही वास्तविक जिज्ञासा है। अतः समस्त कार्यकलापों का केन्द्र केवल तत्व-जिज्ञासा ही होना चाहिए।
श्रील सनातन गोस्वामी एक महाजन हैं। महाजनो येन गतः स पन्थाः, महाजनों ने ही हमारे लिए उचित मार्ग का अन्वेषण किया है, अतः हमे उन्हीं के चरण-चिह्नों का अनुगमन करना चाहिए। जब श्रील सनातन गोस्वामी, चैतन्य महाप्रभु से मिले, तो उन्होंने क्या पूछा?
उनका प्रश्न था “मैं कौन हूँ? मेरी वास्तविक पहचान क्या है? मैं आध्यात्मिक, आधिभौतिक और आधिदैविक त्रि-तापों से क्यों पीड़ित हूँ? इन त्रि-तापों से निवारण हेतु मुझे क्या करना चाहिए? मेरे जीवन का लक्ष्य क्या है और उस लक्ष्य की प्राप्ति का साधन क्या है? मेरा कर्तव्य क्या है? मेरी वास्तविक आवश्यकता क्या है?” ये सभी तत्व-जिज्ञासा कहलाती हैं।
पूर्ण उत्तर किसे ज्ञात है?
तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया।
उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः॥
“तुम गुरु के पास जाकर सत्य को जानने का प्रयास करो। उनसे विनीत होकर जिज्ञासा करो और उनकी सेवा करो। स्वरुपसिद्ध व्यक्ति तुम्हें ज्ञान प्रदान कर सकते हैं, क्योंकि उन्होंने सत्य का दर्शन किया है।” (भगवद्-गीता 4.34)
आपके प्रश्नों का सटीक और पूर्ण उत्तर तत्त्वदर्शी, अर्थात् जो परम सत्य का दर्शन करते हैं, वे ही दे सकते हैं। वह परम सत्य क्या है? अद्वय-ज्ञान-तत्त्व व्रजे व्रजेंद्र-नंदन, नन्द महाराज के पुत्र, कृष्ण ही परम सत्य हैं। जो इस परम सत्य को तत्वतः जानते हैं, वे परम सत्य का दर्शन करते हैं, और वे ही उपरोक्त समस्त प्रश्नों का उत्तर दे सकते हैं। इसलिए मनुष्य को ऐसे गुरु के पास जाना चाहिए, जो इस परम सत्य नन्दनन्दन श्री कृष्ण, के ज्ञाता हैं, जो उनका दर्शन करते हैं।
पूर्णतया कृष्ण पर निर्भरता
परन्तु, प्रश्न है कि ऐसा व्यक्ति कहाँ मिलेगा? क्या आप उसे जानते हैं? यदि आप उसे नहीं जानते, तो आप उनसे कैसे मिलेंगे? बद्ध जीव को ऐसे व्यक्ति के बारे में कोई ज्ञान नहीं होता। बद्ध जीव में चार दोष होते हैं: भ्रम - त्रुटि करने की प्रवृत्ति, प्रमाद - भ्रमित होने की प्रवृत्ति, विप्रलिप्सा - धोखा देने की प्रवृत्ति, और करणापाटव - अपूर्ण या दोषयुक्त इन्द्रियाँ। यदि आप सोचते हैं कि ‘नेत्रों द्वारा दृश्य प्रत्येक वस्तु सत्य है’ तो आप धोखा खा जायेंगे। आप जो देखते हैं वह सदैव सत्य नहीं होता है क्योंकि आपकी इंद्रियाँ अपूर्ण हैं। उदाहरणार्थ, जब आप एक द्रुतगामी ट्रेन में बैठे होते हैं, तो बाहर वृक्ष तेजी से पीछे भागते हुए प्रतीत होते हैं। परन्तु, क्या यह सत्य है? नहीं, वास्तविकता यह है कि आप भाग रहे हैं, और पेड़ स्थिर हैं, परंतु आपके नेत्र ठीक विपरीत देखते हैं। तो फिर आप क्यों सोचते हैं कि आप अपनी इन्द्रियों द्वारा सब कुछ जान लेंगे? यह संभव नहीं है। फिर आप गुरु को कैसे पहचानेंगे?
भक्त: कृष्ण हमें गुरु भेज देंगे।
श्री श्रीमद गौर गोविन्द स्वामी: हाँ, यही सत्य है। कृष्ण से प्रार्थना करो, कृष्ण सब कुछ जानते हैं। “हे कृष्ण! मैं आपका नित्य दास हूँ। आप मेरे स्वामी हैं। मैं आपकी सेवा करना चाहता हूँ। लेकिन मैं आपकी सेवा कैसे करूँ? आप कहाँ हैं, और मैं कहाँ हूँ? मैं इस मायारूपी भँवर में डूबा हुआ हूँ। अपने सामर्थ्य के बल पर आपकी सेवा करना मेरे लिए असंभव है। आपके प्रिय और शुद्ध भक्त, गुरु ही मेरी सहायता कर सकते हैं और मुझे आपके निकट ला सकते हैं। परन्तु कौन आपके प्रिय और शुद्ध भक्त हैं, यह तो आप ही जानते हैं, मैं नहीं जानता हूँ। कृपया मेरी सहायता करें। मुझे आपके प्रिय भक्तों के संग की नितान्त आवश्यकता है। यदि मैं उनसे भेंट कर सकूँ, उनके चरणों में समर्पित होकर उनकी सेवा कर सकूँ, और यदि वे प्रसन्न हो जाएँ, तो वे मुझे आपके पास ले जाएंगे।”
यही एकमात्र उपाय है, पूर्ण रूप से कृष्ण पर निर्भर होना चाहिए। कृष्ण करुणामय हैं। कृष्ण हमारे परम पिता हैं। हम उनके पुत्र हैं। हम उनसे विमुख होकर उन्हें भूल गए हैं और इस भयानक संसार-सागर में फंस गए हैं। लेकिन कृष्ण सदैव अपने बच्चों के बारे में चिंतित रहते हैं कि हम कैसे उनके पास लौट आएँ क्योंकि वे अत्यंत दयालु हैं।
अधीर भाव से हृदय में क्रंदन करो
आपको कृष्ण के सम्मुख बारंबार क्रंदन करना चाहिए, "हे कृष्ण, कृपया मेरी सहायता कीजिए! अपने अत्यन्त प्रिय भक्त को मेरी सहायता हेतु भेजिए!" तब कृष्ण आपके लिए व्यवस्था करेंगे। श्रीकृष्ण की व्यवस्था ही सर्वोत्तम होती है। आपकी व्यवस्था दोषयुक्त होगी। इसलिए आपको पूर्ण रूप से कृष्ण की कृपा पर निर्भर होना चाहिए और अपने हृदय में उस कृपा के लिए क्रंदन करना चाहिए। ऐसा नहीं हो सकता कि आप विश्राम करो और आशा करो कि कृष्ण स्वयं गुरु भेज देंगे। नहीं! आपको अधीर होना होगा, मैं कृष्ण कृपा कैसे प्राप्त करूँ? कब मैं उनके प्रिय भक्त से भेंट करूँगा? आपको अन्तः हृदय से क्रंदन करना होगा। यदि आपके सिर में आग लग जाए तब क्या आप शांत बैठोगे? नहीं! तुम अग्नि शमन हेतु तुरंत जल ढूँढोगे। वास्तव में आपकी स्थिति ऐसी ही है, इसलिए आपको क्रंदन करना चाहिए, हे कृष्ण! हे कृष्ण! कृपया मुझ पर अपनी कृपा वर्षित कीजिये। अपने प्रिय भक्त को मेरे पास भेजिए। मैं इस संसार-रूपी भयंकर तप्त तवे में जल रहा हूँ।
यह भौतिक जगत संसार-दावानल, वनाग्नि के समान है। श्रीमद्भागवतम् के पाँचवें स्कन्ध में जड़ भरत, राजा रहुगण से कहते हैं कि यह संसार एक घना जंगल है, भवाटवी। तुम इस भवाटवी में भटक रहे हो और बाहर आने का मार्ग तुम्हें ज्ञात नहीं है।
जंगल में अनेकों वृक्ष, काँटे, पत्थर, जंगली पशु, पहाड़ और असंख्य बाधाएँ होती हैं। मैं भ्रमित हूँ, “किस दिशा में जाऊँ?” कभी-कभी दो लकड़ियों के घर्षण से जंगल में आग लग जाती है। तब मनुष्य पुकारता है, ‘ओह! मैं दावाग्नि में जल रहा हूँ!’ जब आपके सिर में आग लगी हो, तब क्या आप शांत बैठ सकते हैं? नहीं, आप तुरंत पानी ढूंढेंगे, “पानी कहाँ है? पानी कहाँ है?” इसी प्रकार हमें रोना होगा, तब कृष्ण समझेंगे, “हाँ, अब यह वास्तव में मेरे लिए रो रहा है।” और तब कृष्ण समुचित व्यवस्था करेंगे।
सौभाग्य या दुर्भाग्य
ब्रह्माण्ड भ्रमिते कोन भाग्यवान् जीव।
गुरुकृष्ण - प्रसादे पाय भक्तिलता - बीज॥
“सारे जीव अपने-अपने कर्मों के अनुसार समूचे ब्रह्माण्ड में घूम रहे हैं। इनमें से कुछ उच्च ग्रह-मण्डलों को जाते हैं और कुछ निम्न ग्रह-मण्डलों को। ऐसे करोड़ों भटक रहे जीवों में से कोई एक अत्यन्त भाग्यशाली होता है, जिसे कृष्ण की कृपा से अधिकृत गुरु का सानिध्य प्राप्त करने का अवसर मिलता है। कृष्ण तथा गुरु दोनों की कृपा से ऐसा व्यक्ति भक्ति रूपी लता के बीज को प्राप्त करता है” । (चैतन्य-चरितामृत, मध्य-लीला 19.151)
यहाँ ‘भाग्यवान’ शब्द अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। असंख्य ब्रह्माण्डों में भटकने के बाद किसी ‘भाग्यवान’ जीव को कृष्ण की विशेष कृपा से गुरु प्राप्त होते हैं। तत्पश्चात गुरु की कृपा से जीव को कृष्ण की प्राप्ति होती है। इस प्रकार, गुरु-कृष्ण-कृपा से ही भक्ति लता का बीज अंकुरित होता है। जीव को अपने भाग्यानुसार गुरु प्राप्त होते हैं। किसी का सौभाग्य होता है, तो किसी का दुर्भाग्य। सौभाग्यवान जीव को कृष्ण का अनुग्रह प्राप्त होता है और उसे कृष्ण द्वारा प्रेषित गुरु मिलते हैं। परन्तु दुर्भाग्यशाली जीव श्री-गुरु तक कैसे पहुँच सकेगा?
श्रीकृष्ण ही सर्वज्ञ हैं। उन्हें भली-भाँति ज्ञात है कि प्रत्येक व्यक्ति की अभिरुचि और स्वभाव भिन्न-भिन्न है। सभी एक समान नहीं हैं। जीव के स्वभाव के अनुसार कृष्ण व्यवस्था करते हैं। “आप एक सुन्दर स्त्री से विवाह करना चाहते है?, यही आपकी इच्छा है? “ठीक है, विवाह करो।” परन्तु, यह गुरु का कार्य नहीं है, यह माया का कार्य है। इसलिए कृष्ण माया से कहते हैं, “ठीक है मायादेवी, तुम इसे उसी प्रकार का गुरु प्रदान करो क्योंकि इसे ऐसा ही गुरु चाहिए।”
छल-कपट रहित कृष्ण की सेवा करें
सरलता ही वैष्णवता है। सरल भक्तों के हृदय में कोई भौतिक इच्छा या छल-कपट नहीं होता है। वे कहते हैं, “हे कृष्ण! मैं केवल आपकी सेवा करना चाहता हूँ। मुझे आपसे कुछ नहीं चाहिए। यह निष्कपट-सेवात अर्थात छल-कपट रहित कृष्ण की सेवा है।
न धनं न जनं न सुन्दरीं
कवितां वा जगदीश कामये।
मम जन्मनि जन्मनीश्वरे
भवताद् भक्तिरहैतुकी त्वयि॥
“हे कृष्ण! मैं आपसे धन नहीं चाहता हूँ। मैं आपसे भौतिक अनुयायी या प्रशंसक नहीं चाहता। न सुन्दरीं कवितां, मैं आपसे सुंदर स्त्री नहीं चाहता हूँ। मैं आपसे मोक्ष भी नहीं चाहता हूँ। जन्मनीश्वरे भवताद् भक्तिरहैतुकी त्वयि, जन्म-जन्मांतर मैं आपकी प्रेममयी सेवा करना चाहता हूँ जिससे आप सुखी और प्रसन्न रहें। मैं आपसे और कुछ भी नहीं चाहता हूँ।”
यह निष्कपट-सेवात, छल-कपट रहित सेवा है। जो जीव पूर्ण रूप से भगवान श्रीकृष्ण पर निर्भर होता है, वही भाग्यवान है। वह सरल हृदयवाला और कपट रहित होता है। वह भगवान से अपने लिए कुछ भी नहीं चाहता है। वह केवल श्रीकृष्ण के सुख और प्रसन्नता की कामना करता है। श्रीकृष्ण ऐसे भक्त से प्रसन्न हो जाते हैं। ऐसा जीव वास्तव में भाग्यवान होता है। श्रीकृष्ण स्वयं उसके समक्ष गुरु-रूप में प्रकट होते हैं। ऐसे गुरु की वाणी अत्यन्त मधुर और अमृतमय होती है, कर्ण-रसायन।
कृष्ण ही गुरु के रूप में प्रकट होते हैं
नायमात्मा प्रवचनेनलभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन।
यम एवैष वृणुतेतेन लभ्यस्तस्यैषात्मा विवृणुते तनुंस्वाम्॥
[कठ उपनिषद 1.2.23]
आप आत्म-तत्त्व या परमात्मा-तत्त्व को अपनी भौतिक विद्वत्ता, बुद्धि, विद्या या योग्यता के बल पर नहीं समझ सकते हैं। न बहुना श्रुतेन, न तो आप कर्मी, ज्ञानी, योगी तथा पंडितों से श्रवण कर समझ सकते हैं।
तो फिर कृष्ण को कैसे समझा जा सकता हैं? जिनके मन में कृष्ण प्राप्ति की तीव्र अभिलाषा है। मैं कृष्ण को कैसे प्राप्त कर सकता हूँ? कैसे मैं उनकी सेवा कर सकता हूँ? कृष्ण उनके समक्ष गुरु के रूप में स्वतः प्रकट होते हैं, यम एवैष वृणुतेतेन लभ्यस्तस्यैषात्मा विवृणुते तनुंस्वाम्। कृष्ण हृदय में परमात्मा रूप में बैठे हुए हैं। वे समझ जाते हैं कि यह जीव मेरे लिए क्रंदन कर रहा है। अतः वे शरीर धारण कर गुरु के रूप में प्रकट होते हैं।
भगवत्-माया गुरु भेजती है
कृष्ण भली भांति जानते हैं कि कौन सरल-हृदय हैं, कौन कपटी है, किसके हृदय में भौतिक इच्छाएँ हैं। इसलिए कृष्ण माया को आदेश देते हैं, “उसे वैसा ही गुरु भेजो।” कृष्ण के आदेशानुसार भगवत्-माया वैसी ही व्यवस्था करती है। ऐसे लोग प्रामाणिक गुरु न पाकर केवल कपटी गुरु प्राप्त करते हैं। परन्तु जो निष्कपट और सरल-हृदयवाले हैं, जो भौतिक इच्छाओं से रहित हैं, जो कृष्ण प्राप्ति एवं सेवा हेतु हृदय में निरंतर क्रंदन करते हैं, ऐसे भक्तों के समक्ष कृष्ण स्वयं गुरु-रूप में प्रकट होते हैं। प्रामाणिक गुरु प्राप्त करने की यही विधि है।
आध्यात्मिक बल कैसे प्राप्त होगा?
आप आध्यात्मिक शक्ति कैसे प्राप्त कर सकते हैं?
भक्त: गुरु और कृष्ण की संयुक्त कृपा से?
श्री श्रीमद गौर गोविन्द स्वामी: यदि आप प्रेम और स्नेह से गुरु-सेवा और नाम-सेवा करते हैं, तो आपको अपार आध्यात्मिक शक्ति प्राप्त होगी।
कृष्ण किसकी प्रार्थना सुनते हैं? “हे कृष्ण! मैं आपसे कुछ भी नहीं चाहता हूँ, न धनं न जनं न सुन्दरीं कवितां । मैं अपने सुख के लिए कुछ नहीं चाहता हूँ। मैं पूर्ण रूप से आपकी कृपा पर आश्रित हूँ। जो भी आप मुझसे करवाना चाहें, भले ही वह कार्य मेरे लिए अत्यन्त कठिन क्यों न हो, मैं प्रसन्नतापूर्वक करूँगा। आपकी इच्छा-पूर्ति ही मेरी प्रसन्नता है।” कृष्ण केवल ऐसे भक्तों की प्रार्थना सुनते हैं।
कृष्ण सर्व-मंगलमय हैं। उनकी व्यवस्थाओं में कुछ भी अशुभ नहीं है, लेकिन हम उन्हें समझ नहीं पाते है क्योंकि हम शारीरिक स्तर पर हैं। हम सदा शारीरिक सुख-सुविधाएँ और भोग चाहते हैं। हम कुछ भी असुविधाजनक नहीं चाहते हैं। कृष्ण ऐसे दैहिक स्तर पर स्थित व्यक्ति की प्रार्थना कभी नहीं सुनते। कृष्ण केवल शुद्ध चित्त व्यक्ति की प्रार्थना सुनते हैं। भक्तिविनोद ठाकुर गीतावली (4.1) में गाते हैं:
प्रभु तव पद-युगे मोर निवेदन ।
नाहि मागी देह-सुख, विद्या, धन, जन॥
"हे प्रभु, आपके चरण कमलों में मेरी यही प्रार्थना है। मुझे 'देह-सुख' नहीं चाहिए। मैं आपसे अपने शारीरिक सुख या भोग की कामना नहीं करता हूँ। विद्या, धन, जन - मैं आपसे भौतिक शिक्षा, भौतिक धन या भौतिक अनुयायी भी नहीं चाहता हूँ।"
यही महाप्रभु की प्रार्थना है, न धनं न जनं। भक्तिविनोद गाते हैं, "नाहि मागि स्वर्ग, आर मोक्ष नाहि मागि"। मैं आपसे स्वर्गीय सुख नहीं चाहता हूँ। मैं मोक्ष भी नहीं चाहता हूँ।
निज-कर्म-गुण-दोषे जे जे जन्म पाइ
जन्मे जन्मे जेन तव नाम-गुण गाई॥
भक्तिविनोद ठाकुर कहते हैं, "मैं आपसे मेरे कर्म-फल नष्ट करने के लिए नहीं कह रहा हूँ। यदि मेरे गुण और कर्म के अनुसार मेरा जन्म एक कीड़े के रूप में सुनिश्चित है, तो मुझे वह स्वीकार है, लेकिन उस जन्म में भी मैं आपकी सेवा करना चाहता हूँ। जन्मे जन्मे जेन तव नाम-गुण गाई, मेरे कर्मानुसार मुझे जो भी जन्म प्राप्त हो, उस जन्म में मैं आपके पवित्र नाम का गायन करना चाहता हूँ। मैं आपकी सेवा करना चाहता हूँ।" कृष्ण केवल ऐसी प्रार्थना सुनते हैं। "कृष्ण, मुझे एक सुन्दर पत्नी दे दो। कृष्ण, मुझे यह दे दो, मुझे वह दे दो।" यह एक शाखा से दूसरी शाखा पर कूदने जैसा है। वे आपकी बात नहीं सुनेंगे। कोई परमेश्वर को कैसे समझ सकता है?
भक्त 2: भक्तिमय सेवा से।
श्री श्रीमद् गौर गोविंद स्वामी: क्या आप जानते हैं कि भक्तिमय सेवा का अर्थ क्या है? आपको श्रवण करना होगा। आपको सद्गुरु, श्री-गुरु के मुख से अविचल श्रद्धा के साथ भागवत-कथा सुननी होगी। आपको गुरु के चरण कमलों में पूर्ण रूप से समर्पित होना होगा। इसके अतिरिक्त कृष्ण को समझने का अन्य कोई उपाय नहीं है।
समर्पण, सेवा और जिज्ञासा
भक्त 2: क्या गुरु का शारीरिक रूप से उपस्थित होना आवश्यक है?
श्री श्रीमद् गौर गोविंद स्वामी: हाँ बिलकुल। वह एक साकार गुरु हैं, निराकार नहीं।
भक्त 2: कोई तर्क कर सकता है कि मैं शास्त्र पढूंगा और...
श्री श्रीमद् गौर गोविंद स्वामी: शास्त्र का आदेश है, गुरु स्वीकार करो। अतः आपको गुरु स्वीकार करना होगा। आपको उनके पास जाकर प्रणिपात, परिप्रश्न और सेवा करनी होगी अर्थात समर्पित होना होगा, गुरु की सेवा करनी होगी और तत्पश्चात जिज्ञासा कर सकते हो। यदि गुरु स्वीकार नहीं करेंगे, तो आप किससे जिज्ञासा करेंगे? ग्रंथों से?
भक्त 2: आपके प्रेम प्राप्त करने से पहले ही यदि गुरु इस धरा से चलें जाएं...
श्री श्रीमद् गौर गोविंद स्वामी: अरे बाबा! गुरु समस्त व्यवस्थाएँ करके जाते हैं। तुम चिंता मत करो। उनकी व्यवस्थाएँ पूर्ण रूप से सही होती हैं। उन्होंने आपका उत्तरदायित्व लिया है; आपको शिष्य के रूप में स्वीकार किया है। गुरु का अर्थ है गुरुत्व (भारी), लघु नहीं। गुरु का भारी उत्तरदायित्व होता है। उन्होंने आपको माया के दुर्ग से बाहर निकालने का भारी उत्तरदायित्व लिया है। उन्हें अपना उत्तरदायित्व भली भांति ज्ञात है। यह उत्तरदायित्व वह कैसे पूर्ण करेंगे, यह उन पर निर्भर करता है। तुम इसकी चिंता मत करो। आप केवल पूर्णतया समर्पित होकर गुरु की सेवा करो। आपको गुरु में दृढ़, और अटूट विश्वास रखना चाहिए। उनके आदेश का यथावत पालन करो। कुछ भी मनगढ़ंत परिवर्तन मत करो। तब आपकी सफलता सुनिश्चित है।
पूर्ण समर्पण और अटूट विश्वास
भक्त 1: श्रील प्रभुपाद ने लगभग 10,000 शिष्यों को दीक्षा दी थी, और अब लगभग 95% छोड़ चुकें हैं। उनकी गति क्या होगी?
श्री श्रीमद् गौर गोविंद स्वामी: वे क्यों चले गए?
भक्त 2: शायद उनका विश्वास नहीं था?
श्री श्रीमद् गौर गोविंद स्वामी: हाँ, उन्हें विश्वास नहीं था।
भक्त 1: तो क्या श्रील प्रभुपाद अभी भी उनके लिए उत्तरदायी हैं?
श्री श्रीमद् गौर गोविंद स्वामी: क्यों? अगर आपको गुरु में विश्वास नहीं है, तो वे आपके लिए क्यों उत्तरदायी होंगे? उन्हें गुरु में विश्वास नहीं था और वे समर्पित नहीं थे। वास्तव में, वे सब महा पाखंडी थे। उनका समर्पण केवल दिखावा था। अन्यथा वे दूर क्यों चले गए?
भक्त 1: इसका अर्थ है कि यद्द्यपि हम दीक्षा भी ले लें, परन्तु जब तक हम वास्तव में समर्पण नहीं करते, गुरु हमारा उत्तरदायित्व नहीं लेंगे?
श्री श्रीमद् गौर गोविंद स्वामी: नहीं। शिष्य ने समर्पण क्यों नहीं किया? क्योंकि उसे गुरु में विश्वास नहीं था। उसकी दीक्षा औपचारिकता मात्र थी। आपको विश्वास नहीं है। आप वास्तव में समर्पित नहीं हैं। आपने समर्पित होने का दिखावा मात्र किया है। जैसे कृष्ण सर्वज्ञ हैं, वैसे ही गुरु भी सर्वज्ञ हैं। जैसा बोओगे, वैसा काटोगे।
भक्त 1: यदि प्रभुपाद को पता था कि ऐसा होगा, तो उन्होंने इतने सारे लोगो को दीक्षा क्यों दी?
श्री श्रीमद् गौर गोविंद स्वामी: अरे बाबा! क्योंकि वे सब दीक्षा लेना चाहते थे। ठीक है, ले लो।
"पिताजी! मुझे यह चाहिए!, मुझे यह चाहिए"
"परन्तु, वह आग है।"
"नहीं, फिर भी मुझे यह चाहिए!"
पिता कहता है, "अरे! वह आग है! इसे मत छूओ!"
लेकिन बच्चा रोता है और कहता है, "नहीं, नहीं.....! मुझे यह चाहिए!"
"ठीक है, ले लो।" क्या करें? उसे जलने दो। तब सीखेगा। तब वह मदद के लिए पुकारेगा।
अतः गुरु के चरण कमलों में पूर्ण समर्पण आवश्यक है, आंशिक, सशर्त, अथवा कृत्रिम समर्पण नहीं होना चाहिए। उनसे दृढ़, और अटूट श्रद्धा के साथ भागवत-कथा सुने। तभी आप भगवान को समझेंगे, अन्यथा नहीं।
अध्यात्मिक गुरु के आदेश की अवहेलना करना
आध्यात्मिक गुरु के आदेश की अवहेलना सबसे गंभीर नाम-अपराध है। यह अपराध कौन करता है? इस विषय में कृष्ण कहते हैं:
आचार्यं मां विजानीयान्नवमन्येत कर्हिचित्।
न मर्त्यबुद्ध्यासूयेत सर्वदेवमयो गुरु:॥
“मनुष्य को चाहिए कि वह आचार्य को मेरा ही स्वरूप जाने और किसी भी प्रकार से उनका अनादर नहीं करे। उन्हें सामान्य पुरुष समझते हुए उनसे ईर्ष्या-द्वेष नहीं रखे क्योंकि वे समस्त देवताओं के प्रतिनिधि हैं।” (श्रीमद्-भागवतम 11.17.27)
कृष्ण कहते हैं, "गुरु, आचार्य, मेरे ही स्वरूप हैं, मां विजानीयान्। उन्हें साधारण नश्वर प्राणी न समझें, न मर्त्यबुद्ध्यासूयेत । वह मेरे ही समान हैं।" समस्त देवतागण उनमें समाहित हैं। परन्तु, कोई सोच सकता है – वे तो एक नश्वर प्राणी जैसे ही दिखते हैं, वे कृष्ण के समान कैसे हैं? मैं तो नहीं देख सकता। मेरे ही समान उन्हें भी भूख लगती है, वे भी खाते हैं, वे थक जाते हैं, वे भी मल-मूत्र त्यागते हैं, कभी-कभी बीमार पड़ते हैं। तो फिर, वे सामान्य नश्वर व्यक्ति कैसे नहीं हैं, न मर्त्यबुद्ध्यासूयेत ? मैं यह नहीं देख सकता। मैं इसे स्वीकार नहीं कर सकता। यह सबसे गंभीर नाम-अपराध है। ऐसी मानसिकता का व्यक्ति गुरु के आदेश की अवहेलना करता है।
वह भक्त टिप्पणी कर रहा था कि प्रभुपाद ने हजारों लोगों को दीक्षा दी, लेकिन अब वे सब छोड़ कर चले गए हैं। वे क्यों चले गए? क्योंकि उन्होंने यही अपराध किया। उन्होंने प्रभुपाद के आदेश का उल्लंघन किया। वे प्रभुपाद को समझ नहीं पाए। प्रभुपाद ने उन्हें सोलह माला शुद्ध नाम जप और नियमों (मांसाहार निषेध, नशा निषेध, अवैध यौन संबंध निषेध और जुआ निषेध) का सख्ती से पालन करने का निर्देश दिया। परन्तु, वे सभी विधि-विधानों को भंग कर रहे हैं, और निर्धारित सोलह माला का जप भी नहीं कर रहे हैं। क्योंकि वे शरणागत नहीं हैं, उन्होंने गुरु को पूर्ण रूप से स्वीकार नहीं किया है। वे समझते हैं कि गुरु भी हमारे जैसे नश्वर व्यक्ति हैं। अतः हम उनके आदेश का उल्लंघन कर सकते हैं।
इस विकट स्थिति से हमें कौन बचा सकता है?
इस भौतिक संसार में, पदम् पदम् यद् विपदम्, हर कदम पर विपदा है। हमारी अनंत भौतिक इच्छाएँ हैं जो हमें इस भयानक भौतिक महासागर में बाँधकर रखती हैं। हम निरंतर इस सागर में डूब रहे हैं! इस भयावह स्थिति में कौन हमारी रक्षा कर सकता है? केवल गुरु-पाद-पद्म, गुरु के चरण कमल ही हमारी रक्षा कर सकते हैं। अतः यदि आप गुरु को साधारण मनुष्य समझते हैं, तो यह गंभीरतम नाम-अपराध हैं। यदि आपका उनके शब्दों में विश्वास नहीं है, तो आप उनके चरणों में समर्पण नहीं कर सकेंगे, आप केवल दिखावा करेंगे। भक्तों के छोड़ कर जाने का एकमात्र यही कारण है।
संन्यास का क्या अर्थ है?
संन्यास का अर्थ है अहर्निश हरि-भजन में रत रहना। ढोंगी भक्तों का संन्यास भौतिक भोग (भुक्ति) और भौतिक बंधन से छुटकारा (मुक्ति) पाने के लिए होता है। लेकिन संन्यास का वास्तविक अर्थ है भौतिक इच्छा शून्य, भौतिक भोग की कामना शून्य और यहाँ तक की भौतिक मुक्ति की भी कामना शून्य। भवताद् भक्तिरहैतुकी त्वयि, जन्म-जन्मांतर मैं केवल शुद्ध भक्ति ही चाहता हूँ। यही सन्यास का वास्तविक अर्थ है। ऐसे भक्त ही भक्ति-देवी की कृपा प्राप्त करते है।
हमारी अल्प स्वतंत्रता का समुचित उपयोग
सर्व मंगल हेतु हमारा मनोभाव और विचार कैसा होना चाहिए? इसकी शिक्षा गुरु देते हैं कि इस जगत की समग्र सामग्री कृष्ण सुख के लिए है, न कि स्वसुख के लिए। जिनको यह ज्ञान है, उसके लिए सब कुछ मंगलमय है। वह प्रत्येक वस्तु का उपयोग कृष्ण की सेवा में करता है। अतः उसे कोई दुःख नहीं मिलता। पूर्ण समर्पित भक्त की कोई स्वतंत्रता नहीं होती है। यदि आप अपनी स्वतंत्रता बनाए रखते हैं तो आप पूर्ण समर्पित नहीं हैं, अपितु ढोंगी हैं। वास्तव में आपको प्रदत्त अल्प स्वतंत्रता गुरु और गौरांग को समर्पण करने के लिए ही है। स्वतंत्रता का यही समुचित उपयोग है। पूर्ण रूप से समर्पण करने पर, आपकी निजी स्वतंत्रता नहीं रहती, तब आप गुरु के अधीन रहते हैं।
जो व्यक्ति कुटिलता और कपट से रहित होकर पूर्ण रूप से समर्पित हो जाता है, तथा सरल हृदय और मन से, गुरु, गौरांग की सेवा करता है, और हरि-भजन में संलग्न रहता है। वह निश्चित रूप से इसी जीवन में कृष्ण को प्राप्त कर सकता है। लेकिन ऐसा कितने लोग कर रहे हैं? अधिकतर ढोंगी हैं। गुरु को भी विदित है कि वे ढोंगी हैं। वे अपनी स्वतंत्रता बनाए रखना चाहते हैं। वे अपनी इच्छानुसार कार्य करते हैं, गुरु की आज्ञा नहीं सुनते हैं। वे बाह्य रूप से कहते हैं, "हाँ, हाँ, हाँ, गुरु महाराज। हाँ, मैं समझ गया। ओह, ठीक है, ठीक है। मैं आपकी आज्ञानुसार कार्य करूँगा। लेकिन अभी मेरी स्थिति ठीक नहीं है। अनेक आर्थिक एवं पारिवारिक कठिनाइयाँ हैं। मैं उन्हें सुलझाने का प्रयास कर रहा हूँ और तत्पश्चात आपकी आज्ञानुसार कार्य करूँगा।" यदि आपका ऐसा व्यवहार है, तो आपको कृपा कैसे मिलेगी? गुरु आदेश निर्विचारे ग्रहणीय, गुरु का आदेश बिना किसी विचार-विमर्श के तत्क्षणात् स्वीकार करना चाहिए।
आदेश का यथावत पालन करें
हम भगवान श्री राम के उदाहरण से स्पष्ट समझ सकते हैं। भगवान् राम को राजा नियुक्त करने की घोषणा हुई थी, परन्तु, रातों-रात निर्णय बदल गया। अगले दिन प्रातः पुनः घोषणा हुई, "भरत राजा बनेंगे और राम को चौदह साल के लिए वन जाना होगा।" भगवान राम ने इस निर्णय को सहर्ष स्वीकार कर लिया। उन्होंने प्रत्युत्तर में नहीं पूछा कि "मैं वन क्यों जाऊँ? राज सिंहासन मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है।" उन्होंने आज्ञा को यथावत स्वीकार किया और तत्क्षण वन के लिए निकल पड़े। इस प्रकार उन्होंने बिना तर्क-वितर्क किये आज्ञा का यथावत पालन किया।
जब भरत अयोध्या लौटे, तो उन्हें पूरा घटनाक्रम पता चला? वह समझ गए कि यह उनकी माता कैकेयी का षड्यंत्र था। अतः वे उन पर अत्यधिक क्रोधित हुए। भरत आदर्श भाई हैं। उन्होंने कहा, "नहीं! अयोध्या भ्राता राम की है। राम ही राजा हैं। केवल वे ही सिंहासन पर आरूढ़ हो सकते हैं। मैं उनका सेवक हूँ। मैं अपने स्वामी के पद पर कैसे बैठ सकता हूँ?"
भरत राम को वापस लाने के लिए जंगल में गए, लेकिन राम वापस नहीं लौटे। अपितु उन्होंने भरत से कहा, "गुरुजनों का जो भी आदेश है, उसका यथावत पालन करो। उसमें कोई तर्क-वितर्क मत करो। हम दोनों के लिए यही उचित है। चौदह साल तक मुझे वन में निर्वासित रहना होगा। यह गुरु का आदेश है। यह कितना भी दूभर क्यों न हो, मुझे वन में रहना ही होगा, और तुम्हें भी चौदह साल तक शासन करना होगा। बस यथावत पालन करो।" तब कुछ भी कहने के लिए शेष नहीं रहा।
भरत ने कहा, "मैं आपका सेवक हूँ, अयोध्या पर आपका ही अधिकार है। अतः केवल आप ही सिंहासन पर विराजमान हो सकते हैं। मैं आदेशानुसार शासन करूँगा, लेकिन मैं सिंहासन पर कदापि नहीं बैठूंगा। मैं आपके प्रतिनिधि या सेवक के रूप में चौदह वर्षों तक शासन करूँगा।"
उन्होंने राम की चरण पादुकाएँ लीं, उन्हें अपने मस्तक पर रखा, और फिर सिंहासन पर विराजित कर दिया और घोषणा की, "राम ही राजा हैं। मैं उनकी अनुपस्थिति में चौदह वर्षों तक उनके प्रतिनिधि या सेवक के रूप में शासन कर रहा हूँ। मैं केवल उनके आदेश का पालन कर रहा हूँ।" यही प्रक्रिया है। उन्होंने कोई तर्क-वितर्क नहीं किया। गुरु के आदेश का पालन इसी तरह करना चाहिए।
[कक्षा में एक भक्त से:] आप सोच रहे हैं, "ओह, मुझे यह कठिनाई है, अभी यह समस्या है। मेरी परिस्थिति ठीक नहीं है। मैं गुरु के आदेश का पालन नहीं कर सकता हूँ।"
लेकिन इस भौतिक जगत में हर क्षण समस्याएँ हैं। यह जगत विपदाओं से युक्त हैं। श्रील भक्तिसिद्धांत सरस्वती गोस्वामी प्रभुपाद महाराज के शब्दों में; यह भौतिक जगत किसी भी सज्जन व्यक्ति के लिए उपयुक्त स्थान नहीं है। शारीरिक, परिस्थितिजन्य, पर्यावरण सम्बन्धी अनेक कठिनाइयाँ हैं।
अतः गुरु के आदेश का यथावत पालन करें। किसी प्रकार का मानसिक तर्क-वितर्क न करें। यही सार तत्व है। तभी आपको गुरु और गौरांग की कृपा प्राप्त होगी। अपनी अल्प स्वतंत्रता त्याग दें। तत्त्वदर्शी गुरु के समक्ष पूर्ण रूप से समर्पित होकर उनकी निष्कपट-सेवा करें और उनसे भगवद्-कथा सुनें। तब आप इसी जीवन में भगवद्-धाम जाएंगे और कृष्ण को प्राप्त करेंगे। यह सुनिश्चित है। यही एकमात्र विचार है।
जोंक जैसी दृढ़ता से उनके के पीछे दौड़ें
ऐसे प्रेमी-भक्त ने कृष्ण को अपने हृदय में प्रेम रज्जु से बाँध लिया है। भक्तिविनोद ठाकुर गाते हैं:
कृष्ण से तोमार, कृष्ण दिते पार ,
तोमार शक्ति आछे ।
आमि त’ कांगाल , कृष्ण कृष्ण बलि,
धाइ तव पाछे पाछे ॥
"हे वैष्णव ठाकुर! कृष्ण आपके हैं। आपने कृष्ण को अपने अन्तः हृदय में बाँध लिया है। अतः केवल आप ही मुझे कृष्ण दे सकते हैं। मैं 'कंगाल' हूँ क्योंकि मैं कृष्ण से विहीन हूँ। मुझे कृष्ण दो, मुझे कृष्ण दो।" शरणागति (7.7.4)
जैसे एक गरीब भिक्षुक धनी व्यक्ति के पीछे भागता है, "हे महोदय, कृपया मुझे एक पैसा दे दीजिए। कृपया मुझे एक पैसा दे दीजिए।" उसी प्रकार, आपको भी एक वैष्णव साधु के पास भिक्षुक जैसी मानसिकता के साथ जाना चाहिए। जैसे जोंक दृढ़ता से चिपक जाती है, बहु कोशिशों के बाद भी छोड़ती नहीं है, वैसे ही वैष्णव साधु के पीछे भागते हुए उनसे कृपा याचना करनी चाहिए; किसी भी दशा में उन्हें छोड़ना नहीं चाहिए। [भिक्षुक जैसी मानसिकता और जोक जैसी दृढ़ता] अति आवश्यक है। तभी साधु-गुरु आप पर अपनी कृपा वृष्टि करेंगे, क्योंकि उनके हृदय में श्यामसुंदर विराजमान हैं। यदि आप ऐसे गुरु की सेवा करके उनकी कृपा प्राप्त करते हैं, तो वे कृष्ण को अपने हृदय से आपके हृदय में स्थानांतरित कर देंगे। उनमें ऐसा करने का सामर्थ्य है। वे कृष्ण को आपके हृदय में प्रकट करा सकते हैं। कृष्ण उनके अनुरोध को अवश्य पूर्ण करते हैं। अन्यथा, अन्य कोई उपाय नहीं है।
गुरु स्वीकार करना अति आवश्यक है
भक्त 3: कोई कह सकता है कि उन्हें प्रभुपाद से कोई विशिष्ट निर्देश नहीं प्राप्त हुआ, तो क्या करना चाहिए?
श्री श्रीमद् गौर गोविंद स्वामी: गुरु सभी शिष्यों को सामान्य निर्देश देते हैं, लेकिन प्रत्येक भक्त के लिए विशिष्ट निर्देश भी होते हैं। आपको अपने लिए विशिष्ट निर्देश को पूछना चाहिए। मैं आपकी सेवा कैसे कर सकता हूँ? मेरे गुरु महाराज (श्रील प्रभुपाद) ने श्रील भक्तिसिद्धांत सरस्वती प्रभुपाद से पूछा था, "मैं आपकी सेवा कैसे कर सकता हूँ?" श्रील भक्तिसिद्धांत सरस्वती ने उनसे कहा, "तुम्हें पाश्चात्य जगत में जाकर अंग्रेज़ी भाषा में कृष्ण भावनामृत का प्रचार करना चाहिए।" यह एक विशिष्ट आदेश है।
भक्त 3: परन्तु, यदि आपको प्रभुपाद से कभी भी कोई विशिष्ट आदेश नहीं मिला तो?
श्री श्रीमद् गौर गोविंद स्वामी: इसका अर्थ है कि आपके साथ धोखा हुआ है। चूँकि आप धोखा खाना चाहते थे, अतः आपके साथ धोखा हुआ है। आपको निवेदन करना चाहिए "कृपया मुझे निर्देश दें। मैं आपकी सेवा कैसे कर सकता हूँ? आप मुझसे क्या चाहते हैं?" इस प्रकार पूछने पर गुरु आपको विशिष्ट निर्देश देंगे। सामान्य निर्देश सभी के लिए होते हैं, सम्पूर्ण जगत के लिए, यहाँ तक कि उनके लिए भी जो शिष्य नहीं हैं।
भक्त 3: कृष्ण भावनामृत संघ विशाल आंदोलन था। जो उच्च पदस्थ नहीं थे, उनके लिए श्रील प्रभुपाद से भेंट और व्यक्तिगत निर्देश प्राप्त करना असंभव था।
श्री श्रीमद् गौर गोविंद स्वामी: शिष्य का अधिकार होता है। उसे गुरु के पास जाना ही चाहिए। उन्हें लाखों दंडवत-प्रणाम अर्पित करें और पूछे, "आप मुझसे क्या चाहते हैं? मैं आपकी सेवा कैसे कर सकता हूँ? आपको किस बात से प्रसन्नता होगी? कृपया मुझे आज्ञा दीजिये।" आपको यह कार्य अवश्य करना चाहिए। अन्यथा, आप धोखा खाना चाहते हैं। आप एक आलसी व्यक्ति हैं , जो आराम से जीना पसंद करते हैं। आप सोचते हैं; मैं गुरु के पास क्यों जाऊँ और अपने लिए अनावश्यक कठिनाई क्यों मोल लूँ? अगर मैं उनके पास गया तो मेरे लिए कठिनाई आएगी। इस प्रकार आप स्वयं को गुरु से दूर रखते हैं। आप तर्क करते हैं, " गुरु के निर्देश पुस्तकों में हैं। मैं पढ़ लूंगा। मुझे जिस भी निर्देश की आवश्यकता होगी, वह मुझे किसी भी कथा वाचक से मिल जाएगा।" यह उस आलसी व्यक्ति की मानसिकता है जो गुरु और गौरांग की सेवा हेतु कष्ट उठाने के लिए प्रस्तुत नहीं है। ऐसा व्यक्ति उन्नति कैसे करेगा?
दुःख और कठिनाई मेरी परम संपत्ति हैं
तोमार सेवाय दुःख होय जत,
सेओ तो’ परम सुख ।
सेवा-सुख-दुःख परम सम्पद,
नाशये अविद्या-दुःख ॥
(शरणागति 8.4)
"आपकी सेवा में आने वाली सभी परेशानियाँ ही परम सुख का कारण बनेंगी, क्योंकि आपकी भक्तिमय सेवा में सुख और दुख दोनों समान रूप से महान धन हैं। दोनों ही अज्ञानता को नष्ट करते हैं।"
श्रील भक्तिविनोद ठाकुर हमें निर्देश देते हैं, "हे प्रभु, हे गुरु और गौरांग! आपकी सेवा में जो भी कष्ट और कठिनाइयाँ हैं, वे मेरे लिए परम सुख हैं। वही मेरे लिए परम सम्पदा हैं।" आपकी सेवा नाशये अविद्या-दुःख, समस्त अज्ञानता को नष्ट करती है और [ज्ञान] चक्षु खोल देती है। आपकी सेवा से सर्वत्र ज्ञान प्रकाशित होगा, लेश मात्र अंधकार नहीं रहेगा। आप स्पष्ट रूप से देख पाएँगे। परन्तु जो व्यक्ति सोचता है कि "यदि मैं गुरु के पास गया तो मेरे सिर पर अनावश्यक कठिनाई आ जाएगी, इसलिए गुरु से दूर रहना ही श्रेयस्कर है। पुस्तकों में सारे निर्देश वर्णित हैं। मैं वहीं से पढ़ लूँगा।" वह गुरु की सेवा को गंभीरता से नहीं लेता है।
कृष्ण और सुदामा का आदर्श उदाहरण
कृष्ण और सुदामा संदीपनी मुनि के आश्रम में विद्यार्थी थे। उन्होंने एक आदर्श स्थापित किया है। एक बार रंधन हेतु आश्रम में काष्ठ नहीं था। इसलिए गुरु-माता ने कहा, "लकड़ी समाप्त हो गयी है। मैं भोजन कैसे पकाऊँ? जंगल से लकड़ियाँ ले आओ।" कृष्ण और सुदामा ने कुल्हाड़ी उठाई और जंगल की ओर निकल पड़े। क्यों? यह गुरु-सेवा है। यद्द्यपि वे परम पुरुषोत्तम भगवान हैं। उनकी इच्छा सर्वोपरि है। भगवान की इच्छा मात्र से ही सृष्टि और संहार होता है। उनकी इच्छा मात्र से तत्क्षण लकड़ियों का ढेर उपस्थित हो सकता। तो फिर, परम पुरुषोत्तम भगवान को कुल्हाड़ी लेकर जंगल जाने की क्या आवश्यकता थी? क्योंकि, यह गुरु-सेवा है, गुरु माँ का आदेश है। अतः उन्होंने सोचा, “हमें यह करना ही होगा”। इसलिए, वे जंगल की ओर गए।
फिर एक अद्भुत घटना घटी। आकाश में काले बादल छा गए, भयंकर आँधी चलने लगी और मूसलाधार वर्षा होने लगी। पृथ्वी जलमग्न हो गई। भयानक अँधेरी रात में गड़गड़ाहट और बिजली चमक रही थी। सुदामा और परम पुरुषोत्तम भगवान जंगल से वापस आश्रम नहीं जा सके। इधर, संदीपनी मुनि उस रात्रि आश्रम में सो नहीं पाए, "ओह, ये दोनों बालक बाहर गए थे, और आज इस भयंकर रात में इतनी तेज वर्षा हो रही है, तेज तूफान है। कक्ष का कपाट भी नहीं खोल सकते, बाहर जाना तो दूर की बात है। वे दोनों कैसे होंगे?" संदीपनी मुनि रात्रि भर चिंतित रहे और सो नहीं सके।
जैसे ही भोर हुई और वर्षा थम गयी, संदीपनी मुनि उन्हें खोजने के लिए बाहर निकले। उन्हें कृष्ण और सुदामा एक वृक्ष के नीचे खड़े दिखाई दिए। वे बारिश से पूर्णतया भीग चुके थे और ठंढ से काँप रहे थे। कृष्ण ऐसे अभिनय कर रहे थे मानो उनका शरीर भौतिक हो। वे हमें शिक्षा दे रहे थे। वे ठंढ़ से काँप रहे थे। उन्होंने गुरु की सेवा के लिए ऐसा शारीरिक कष्ट और दुख सहन किया। संदीपनी मुनि ने उनको आलिंगन करते हुए कहा, "तुम सत्-शिष्य हो। यह शरीर सभी को बहुत प्रिय होता है। कोई भी इसे कष्ट नहीं देना चाहता, लेकिन तुम दोनों ने मेरे लिए ऐसा शारीरिक कष्ट और दुख सहा।"
प्रेमपूर्ण हृदय से गुरु की सेवा करें
कृष्ण कहते है:
नाहमिज्याप्रजातिभ्यां तपसोपशमेन वा।
तुष्येयं सर्वभूतात्मा गुरुशुश्रूषया यथा॥
(श्रीमद्भागवतम् 10.80.34)
"मैं एक ब्रह्मचारी से जो 'तपसोपशम' (ब्रह्मचर्य व्रत पालन में अति सख्त) है, या सन्यास धर्म में सख्ती से स्थित एक संन्यासी से, या एक बहुत ही सख्त गृहस्थ से उतना प्रसन्न नहीं होता, जितना मैं उन व्यक्तियों से प्रसन्न होता हूँ जो कि अपने सुख की चिंता न करते हुए, प्रेमपूर्ण हृदय से गुरु की सेवा करते हैं।"
यहाँ कृष्ण कहते हैं कि मैं उस व्यक्ति से बहुत प्रसन्न होता हूँ जो अपने सुख, शारीरिक कष्ट, दुख या संकट की चिंता किए बिना, प्रेम और स्नेह के साथ निष्कपट-भाव से, प्रेमपूर्ण और शुद्ध हृदय से गुरु की सेवा करता है।
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